
हरलाखी प्रखंड के स्थित नया बीआरसी कार्यालय इन दिनों बाल श्रम के एक गंभीर मामले को लेकर चर्चा में है। गर्मी और उमस के बीच स्कूली ड्रेस पहने छोटे-छोटे बच्चे ट्रैक्टर पर पाठ्यपुस्तकों की ढुलाई करते दिखाई दिए। यह दृश्य देखकर स्पष्ट हो रहा था कि ये बच्चे विद्यालय जाने की बजाय बीआरसी कार्यालय में मेहनत मजदूरी करने पहुंचे थे।
नाबालिग बच्चे ड्रेस पहन आए थे विद्यालय, लेकिन पुस्तकें लोड करने पहुंच गए हरलाखी के उमगांव बीआरसी
उमगांव के नया बीआरसी कार्यालय में बिना किसी डर के उमस भरी गर्मी में छोटे-छोटे बच्चों से ट्रैक्टर पर किताब रखवाया जा रहा था। लेकिन नैतिकता का पाठ पढ़ने वाले गुरु जी ने बाल श्रम उन्मूलन अभियान को ही धजिया उड़ने में कोई कोताही नहीं बरत रही है।
शिक्षा विभाग के एसीएस के द्वारा हाल ही में प्रवेश उत्सव को लेकर लेटर जारी किया गया है जिसमें बच्चों का नामांकन करवाने हेतू स्थानीय जनप्रतिनिधि से लेकर शिक्षा सेवकों के द्वारा जागरूकता अभियान चलाने को कहा गया है लेकिन दुसरी तरफ पुर्व से नामांकित बच्चों के द्वारा बीआरसी कार्यालय में पाठ्य पुस्तकें उठवाया जा रहा है।
एक तरफ शिक्षा विभाग के आलाअधिकारी शिक्षा विभाग को सुदृढ़ करने कि बात कह रहे हैं तो वहीं दुसरी तरफ हरलाखी प्रखंड संसाधन केंद्र पर उन्हीं के विभाग के पदाधिकारी बाल मजदूरी करवा रहे हैं। पाठ्य पुस्तकें लोड कर रहे बच्चे स्कूली पोशाक में नजर आ रहे थे। शिक्षा विभाग के कर्मी मुकदर्शक बनकर देख रहे थे। इससे यह प्रतीत होता है कि बच्चों को विद्यालय से पढ़ाई छोड़ाकर कर पुस्तकें उठवाने हेतू बीआरसी कार्यालय लाए गए थें।
हरलाखी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी सुनील कुमार तिवारी ने प्रतिक्रिया मांगने पर कहा समय नहीं, मीटिंग में है
शिक्षा विभाग ने 31 मार्च को आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त कई कर्मचारियों को बजट की कमी और गलत डेटा फीडिंग का हवाला देकर कार्यमुक्त कर दिया था। वर्तमान में बीआरसी कार्यालय में बहुत कम कर्मचारी बचे हैं, जिनमें एक डाटा एंट्री ऑपरेटर, एक आईबीआरपी, एक परिचारी और खुद प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी शामिल हैं।इस स्थिति में बीआरसी कार्यालय में हो रहे कार्यों की जिम्मेदारी सीधे प्रशासनिक अधिकारियों पर आती है, फिर भी बच्चों से यह काम करवाना न केवल बाल श्रम कानून का उल्लंघन है, बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्य का भी मज़ाक है।
जब प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी सुनील कुमार तिवारी से फोन पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने यह कहकर बात टाल दी कि वह मीटिंग में हैं और बाद में बात करेंगे।
इस पूरे मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब शिक्षा का अधिकार कानून और बाल श्रम निषेध कानून दोनों ही सक्रिय हैं, तो फिर इनका पालन करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या सरकारी विभाग खुद ही कानून को ताक पर रखकर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करेंगे? इलाके में यह मामला अब चर्चा का विषय बन चुका है और लोग न्याय की मांग कर रहे हैं।


