
जब 300 रुपये में बिक रही है पूरी एक जिंदगी, तो सरकार और समाज दोनों को शर्म आनी चाहिएबिहार के युवा पीढ़ी को धीरे-धीरे सूखे नशे और कफ सीरप अपने आगोश में ले रहा है। बस एक सफेद पुड़िया, एक कफ सिरप की शीशी, और एक पूरी पीढ़ी धीरे-धीरे इसके गिरफ्त में होती जा रही है। स्मैक, गांजा और कोडिन युक्त कफ सिरप का जाल अब केवल शहरों की गलियों तक सीमित नहीं रहा ,यह जहर अब बिहार के सुदूर गांवों की चौपालों तक पहुंच चुका है। सवाल यह है कि इस भयावह सच्चाई पर सरकार की नींद कब टूटेगी?

बिहार में शराबबंदी का अधूरा सच,₹300 में बिकती है पूरी जिंदगी
यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। बिहार के सीमावर्ती जिलों में मात्र 300 से 400 रुपये में स्मैक की पुड़िया खुलेआम उपलब्ध है वह भी बिना किसी भय के, बिना किसी छुपाव के। यह काला कारोबार अब किसी गुप्त सूचना का मोहताज नहीं रहा, बल्कि एक खुले घाव की तरह समाज के सामने नासूर बन चुका है।

स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि कुछ भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत के बिना यह धंधा एक दिन भी नहीं चल सकता तो फिर यह नेटवर्क फल-फूल कैसे रहा है? जवाब देने की जिम्मेदारी केवल पुलिस की नहीं, उन हुक्मरानों की भी है जो आंकड़ों में विकास गिनते रहते हैं।
बिहार में शराबबंदी को एक ऐतिहासिक कदम बताया गया था। परंतु इस नीति का एक कड़वा दुष्परिणाम आज सामने है , नशे के शौकीनों ने ‘बिना गंध’ वाले नशे की राह पकड़ ली। कोडिन युक्त कफ सिरप अब बीमारी की दवा नहीं, नशे का सस्ता और सुविधाजनक विकल्प बन गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मात्र 200 मिलीलीटर कफ सिरप का सेवन शराब की एक पूरी बोतल जितना नशा देता है और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसे पीने के बाद मुंह से दुर्गंध तक नहीं आती। यानी पकड़ में आने का खतरा भी नहीं। इसके अलावा व्हाइटनर, पेनकिलर और सॉल्यूशन जैसे रासायनिक पदार्थ भी युवा पीढ़ी को मानसिक अंधेरे की खाई में धकेल रहे हैं।
क्या यह शराबबंदी नीति की सफलता है या उसकी सबसे बड़ी विफलता?
नेपाल सीमा से आता है मौत का सामानपड़ोसी देश नेपाल से गांजा और स्मैक की तस्करी एक सुव्यवस्थित नेटवर्क के जरिये हो रही है और इस नेटवर्क की सबसे दुखद कड़ी यह है कि इसमें बड़ी संख्या में युवा ही शामिल हैं। अधिक मुनाफे के लालच में ये युवा न केवल स्वयं को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि अपने ही मित्रों और परिजनों को नशे के दलदल में धकेलने का काम कर रहे हैं।
सीमावर्ती जिलों में बेरोजगारी और गलत संगति ने इस आग में घी डालने का काम किया है। जब रोजगार नहीं होगा, जब आशा नहीं होगी तो युवा इन्हीं अंधेरी गलियों में भटकेगा। यह सामाजिक असफलता है, केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं।

चिकित्सक स्पष्ट चेतावनी दे रहे हैं , सूखा नशा शरीर को भीतर से खोखला कर देता है। इन रासायनिक पदार्थों के निरंतर सेवन से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य चौपट होता है, बल्कि युवाओं का मानसिक संतुलन भी पूरी तरह बिखर जाता है। यह लत इतनी गहरी होती है कि बिना चिकित्सकीय सहायता के इससे मुक्ति लगभग असंभव है।
पुलिसिया कार्रवाई या लाठी इस संकट का समाधान नहीं है। बिहार की आने वाली पीढ़ी इस प्रदेश की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि यह सफेद धुआं समय रहते नहीं थमा, तो विकास के तमाम दावे खोखले सिद्ध होंगे और यह पीढ़ी केवल आंकड़ों में नहीं, सच में राख बनकर रह जाएगी।